भारत, प्रेस और प्रेस आयोग (भाग-1)
तीसरा प्रेस आयोग, पहला प्रेस आयोग, दूसरा प्रेस आयोग, रामबहादुर राय, जवाहरलाला नेहरू
भारत, प्रेस और प्रेस आयोग (भाग-1)
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भारत, प्रेस और प्रेस आयोग (भाग-1)
कोई भी यह पूछ सकता है कि प्रेस आयोग क्यों जरूरी है? प्रेस आयोग की मांग पर अनेक तरह के भ्रम का आवरण है। सवालों को खोलते इस लेख को दो भागों में पढ़ें।
दिल्ली | कोई भी यह पूछ सकता है कि प्रेस आयोग क्यों जरूरी है? प्रेस आयोग की मांग पर अनेक तरह के भ्रम का आवरण है। सवालों को खोलते इस लेख को दो भागों में पढ़ें।
पहला प्रेस आयोग प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पहल पर बना। इसे पत्रकारों ने बनवाया। संसदीय लोकतंत्र की यात्रा में जो शुरूआती कदम जरूरी थे उनमें एक वह भी था। उस आयोग की सिफारिश पर प्रेस परिषद, रजिस्ट्रार न्यूज पेपर, पत्रकारों के लिए वेतन आयोग बने। समय और संदर्भ बदलते ही दूसरे प्रेस आयोग की जरूरत पड़ी। उसकी रिपोर्ट 29 साल पहले आई थी। तब प्रेस का मतलब होता था- अखबार, ऑल इंडिया रेडियो और उत्सवपूर्ति जैसा दूरदर्शन। आज प्रेस हो गया है मीडिया।

पत्रकार इसे पाबंदी के रूप में देखते और समझते हैं। जहां स्वतंत्रता का वातावरण हो और जो स्वच्छंदता का रूप ले चुका हो वहां अगर प्रेस आयोग से पाबंदी का अर्थ निकले तो फिर कौन इसका समर्थन करेगा। इसके उदाहरण हम परस्पर बातचीत में पाते हैं। लेकिन अजीब अनुभव तो तब हुआ जब पिछले साल इंदौर में ‘प्रभाष प्रसंग’ के अवसर पर भाषायी पत्रकारिता महोत्सव के एक सत्र में पारित प्रस्ताव को प्रधानमंत्री कार्यालय भेजा गया। यह जुलाई 2011 की बात है। तब वहां एक श्रेष्ठ पत्रकार हरीश खरे प्रधानमंत्री के दफ्तर में हुआ करते थे। उनके माध्यम से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को वह प्रस्ताव भिजवाया गया और अनुरोध किया गया था कि पत्रकारों का एक प्रतिनिधि मंडल इस बारे में बात करना चाहता है। इसलिए समय दें। अनेक बार याद दिलाए जाने के बावजूद प्रधानमंत्री से मिलने का समय नहीं मिला और हरीश खरे वहां से निकल आए। जो जानकारी मिली वह सचमुच अजीबो-गरीब है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस बात से दूर रहना चाहते हैं कि उनकी सरकार प्रेस पर किसी तरह की पाबंदी का विचार कर रही है।

तीसरे प्रेस आयोग की मांग क्या पाबंदी लगाने की हिमायत है? इसे समझने के लिए वह प्रस्ताव पढ़े जो वहां पारित हुआ। ‘राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक स्तर पर हो रहे बदलाव में देश को जैसी मीडिया चाहिए उसका निर्णय तो तब ही समीचीन होगा, जब हमारे सामने पूरा एक शोधपरक अध्ययन हो। ऐसा अध्ययन अकादमिक नहीं बल्कि प्रचलित कानून के दायरे में होना चाहिए। यह काम तीसरा प्रेस आयोग ही कर सकता है। इसी कारण पहले और दूसरे प्रेस आयोग जो बनाए गए, वे जांच आयोग कानून के अधीन थे।

पहला प्रेस आयोग प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पहल पर बना। इसे पत्रकारों ने बनवाया। संसदीय लोकतंत्र की यात्रा में जो शुरूआती कदम जरूरी थे उनमें एक वह भी था। उस आयोग की सिफारिश पर प्रेस परिषद, रजिस्ट्रार न्यूज पेपर, पत्रकारों के लिए वेतन आयोग बने। समय और संदर्भ बदलते ही दूसरे प्रेस आयोग की जरूरत पड़ी। उसकी रिपोर्ट 29 साल पहले आई थी। तब प्रेस का मतलब होता था- अखबार, ऑल इंडिया रेडियो और उत्सवपूर्ति जैसा दूरदर्शन। आज प्रेस हो गया है मीडिया। इसमें अखबार, रेडियो, टीवी चैनल, ऑनलाइन मीडिया इत्यादि शामिल हैं। अब यह समावेशी हो गया है। इस तरह इसे चौथे खंभे नहीं, पहले खंभे की हैसियत प्राप्त हो गई है। इस तरह मीडिया नए दौर में है। इसे सरकार की आर्थिक नीतियों से बल मिला है। यह नीति भी 20 सालों से है। जिसमें निरंतर सुधार, संशोधन हो रहे हैं। मीडिया में भी नीतिगत बदलाव के निर्णय सरकार ने समय-समय पर लिए हैं। जैसे विदेशी पूंजी के बारे में। लेकिन ऐसी नीतियां सरकार के तदर्थवाद की द्योतक हैं। इस समय कुछ मसले बिल्कुल नए हैं। कुछ पहले से चले आ रहे मुद्दे भी हैं।

हम यह भी जानते हैं कि पहले प्रेस आयोग को तथ्य जुटाने में बहुत कठिनाइयों से गुजरना पड़ा था। वे कठिनाइयां उसी रूप में न सही पर नए रूप में आ सकती हैं। हमारा मत है कि संसद गंभीर मंथन से तीसरे प्रेस आयोग का गठन सरकार से करवाए। हमारा यह भी मत है कि नीति-नियमन नियंत्रण नहीं होता, वह दिशासूचक होता है जिससे राही एक-एक कदम चलते हुए मंजिल पर पहुंचता है। सही नीतियों से मीडिया स्वतंत्र होकर अपना सामाजिक दायित्व पूरा कर सकेगा। नए संदर्भ में मीडिया के लिए नीति और नए नियामक संस्थान तभी सार्थक रीति से बनाए जा सकेंगे जब हमारे सामने प्रेस आयोग की रिपोर्ट और संस्तुतियां हों।’

यह वह प्रस्ताव है जो इंदौर के भाषायी पत्रकारिता महोत्सव में गंभीर मंथन के बाद पारित हुआ। उस विमर्श में कई नामी और अनुभवी पत्रकार-संपादक थे। इससे सभी सहमत थे। उसमें रामशरण जोशी ने कहा कि पिछले तीस सालों में हमारे राष्ट्र राज्य का चरित्र पूरी तरह बदल गया है। इसलिए तीसरे प्रेस आयोग की जरूरत है। परांजॉय गुहा ठाकुरता ने कहा कि पारदर्शिता के लिए इसका गठन होना चाहिए। ओम थानवी का मत था कि संपादक संस्था के उद्धार के लिए यह जरूरी है। एच.के. दुआ का विचार था कि प्रेस सही रास्ते पर चले इसके लिए प्रेस की मौजूदा स्थिति का अध्ययन जरूरी है। यह काम प्रेस आयोग कर सकता है। साफ है कि एच.के. दुआ जैसे अनुभवी लोग महसूस करते हैं कि प्रेस ने उल्टी राह पकड़ ली है। इन लोगों के अलावा वहां हरिवंश, राहुल देव और नामवर सिंह आदि भी बोले। क्या कोई सोच सकता है कि ये लोग ऐसी बात करेंगे जिससे प्रेस की आजादी पर किसी भी तरह से आंच आए?

ये वे लोग हैं जो प्रेस की आजादी के लिए लड़ते रहना चाहते हैं। हां, यह जरूर है कि ये लोग और वे सभी लोग जो प्रेस आयोग की बात उठा रहे हैं वे प्रेस की आजादी के साथ जुड़ी राष्ट्रीय, सामाजिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारियों के प्रति भी सचेत हैं। ये लोग प्रेस की आजादी को नागरिक की आजादी का हिस्सा मानते हैं। हमारा संविधान भी यही कहता है। जब सूचना का समाज बन रहा है और सूचना के हर स्रोत को खोला जा रहा है तब यह नहीं हो सकता कि प्रेस घरानों के बारे में सूचनाएं न पाई जाएं।

पहला प्रेस आयोग

अध्यक्ष- न्यायमूर्ति जी.एस. राज्याध्यक्ष

सदस्य-  सी.पी. रामास्वामी अय्यर, आचार्य नरेंद्र देव, डॉ. जाकिर हुसेन, वी. के. आर. वी. राव, पी.एच. पटवर्धन, टी.एन. सिंह, जयपाल सिंह, जे. नटराजन/ए.डी. मनि (सदस्य), ए.आर. भट्ट, एम. चेलापति राव।

पहले प्रेस आयोग का कार्यकाल- 3 अक्टूवर 1952 से 14 जुलाई 1954 तक रहा।


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